ZEE जानकारी: बच्चों की खुशी में अपना सब कुछ देखने वाले माता-पिता उनकी जान क्यों ले रहे हैं?

ZEE जानकारी: बच्चों की खुशी में अपना सब कुछ देखने वाले माता-पिता उनकी जान क्यों ले रहे हैं?

कलयुग में अब छोटे छोटे बच्चों की भी हत्या हो रही है और ये हत्याएं मां-बाप ही कर रहे हैं. कोई भी मां-बाप अपने बच्चे की हत्या कैसे कर सकते हैं? इसका ख्याल ही आपके मन को झकझोर देगा. आप सोचेंगे कि कलयुग में परिवार की कड़ियां क्यों बिखर रही हैं और बच्चों की खुशी में अपना सब कुछ देखनेवाले माता पिता उनकी जान क्यों ले रहे हैं? हमारे पौराणिक ग्रंथों और संस्कृति में माता-पिता और बच्चों के रिश्ते को सबसे पवित्र, भावनात्मक और मजबूत माना गया है. ये वो संबंध है जिसकी शुरुआत मां के दुलार से होती है और पिता के अनुशासन से ये प्रगाढ़ होते हैं. माता-पिता ही बच्चों को उंगली पकड़कर जिंदगी के सही रास्ते पर चलना सिखाते हैं. लेकिन बदलते वक्त के साथ बच्चों और उनके पालनहार का रिश्ता भी बदल रहा है. आपको ये जानकर अफसोस होगा कि आजकल के कुछ माता पिता इतने कमजोर हो गए हैं कि दूसरों द्वारा दिए गए दुख को अपना सबसे बड़ा दर्द समझ लेते हैं और कई बार अपने बच्चों की हत्या करके खुद आत्महत्या कर लेते हैं .

दिल्ली के पास गाजियाबाद में गुलशन वासुदेव नामक व्यक्ति ने अपने 2 बच्चों की हत्या करने के बाद अपनी पत्नी और महिला मैनेजर के साथ आत्महत्या कर ली. मंगलवार को 45 वर्ष के गुलशन ने अपनी 19 साल की बेटी कृतिका की गला दबाकर और 13 साल के बेटे रितिक की चाकू मारकर हत्या कर दी और इसके बाद अपनी पत्नी परवीन और महिला मैनेजर संजना के साथ 8वीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली. पुलिस के मुताबिक गुलशन ने अपने रिश्तेदार राकेश वर्मा पर 2 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का आरोप लगाया था. ये रकम ना मिलने से गुलशन की आर्थिक दिक्कतें बढ़ गई थीं और हताशा में उसने ऐसा कदम उठाया. यानी कभी मुश्किल वक्त में काम आने वाले रिश्तेदार ही आज मौत की वजह बन गए हैं.

ऐसी घटनाओं को सिर्फ आपराधिक खबर मानना हमारे समाज और हमारे परिवार के लिए घातक हो सकता है. अपने ही बच्चों की हत्या और परिवार की सामूहिक आत्महत्या कई सवाल खड़े करती है. जिसका सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण बहुत जरूरी है. DNA एक पारिवारिक शो है इसलिए हमने ये तय किया कि इससे उठने वाले सवालों का जवाब हम ढूंढने की कोशिश करें जिससे परिवार की इन बिखरती कड़ियों और मूल्यों को मजबूत कर सकें. कलयुग का परिवार WhatsApp पर अपना Happy वाला Status डालता है. Social Media पर अपनी खुशी की तस्वीरें शेयर करता है. Malls जाता है. लेकिन उनके घर में क्या चल रहा है. क्या समस्याएं हैं, इसकी खबर किसी को नहीं होती है. एक दिक्कत ये भी है कि आजकल लोग अपनी तस्वीरें और Status हर दिन बदलते हैं. Social Media पर शेयर करते हैं... लेकिन अपना दुख किसी को नहीं बताते है. और लोगों को जानकारी अक्सर घटना के बाद मिलती है.

इस घटना की बड़ी वजह आर्थिक तंगी है. समाजशास्त्र के अनुसार औद्योगिक क्रांति के बाद से ही पारिवारिक संरचना बिखरती चली गई है. जबतक परिवार खेती पर निर्भर था. जीवनयापन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हुआ करती थीं. जैसे ही परिवार खेती छोड़कर बिजनेस या नौकरी पर निर्भर हुआ, वो आर्थिक तंगी के चक्रव्यूह में फंसता चला गया. ऐसे हालात में लोगों की आत्महत्या करने की खबरें आती रही हैं. लेकिन पहले बच्चों की हत्या और फिर आत्महत्या समझ से परे है. क्या आप सोच सकते हैं कि एक पिता ने 19 वर्ष तक जिस बेटी को गले से लगाया, उसने अपने ही हाथों से बेटी की हत्या कैसे कर दी? गुलशन वासुदेव, पिछले 13 वर्षों से अपने बेटे की एक एक खुशी का ख्याल रखते थे लेकिन आर्थिक तंगी ने उन्हें अपने बेटे की हत्या करने के लिए कैसे मजबूर कर दिया?

हमारे समाज में रिश्तों का बड़ा महत्त्व होता है. संबंधों से ही हमारे आस पास की दुनिया बनती है. और रिश्तों को, परिवार को और प्यार को जीवन का सबसे बड़ा आधार माना जाता है. गाजियाबाद के इस परिवार में 4 लोग थे.. वो चाहते तो मिलकर हालात का सामना कर सकते थे . और अपने परिवार के साथ दुख बांटकर अपने बच्चों को बेहतर भविष्य दे सकते थे. लेकिन लगता है नए जमाने में माता पिता की भावनाओं में अब पहले जैसी मजबूती नहीं रही. इसलिए नकारात्मक परिस्थितियों के कठिन टेस्ट में ये रिश्ते फेल हो रहे हैं.

लेकिन ये कोई पहली घटना नहीं है इससे पहले वर्ष 2018 में दिल्ली में एक ही परिवार के 11 लोगों ने सामूहिक आत्महत्या की थी. जांच के बाद पता चला था कि अंधविश्वास के चक्कर में इन सभी लोगों ने अपनी जान दे दी. तो क्या ये हमारे समाज का एक नया ट्रेंड बनता जा रहा है?

कलियुग के माता पिता अपने बच्चों के साथ ऐसा काम कर रहे हैं जबकि जानवर भी अपने बच्चों की पूरी हिफाजत करते हैं. आज आपको जंगली जानवरों के ऐसे Videos दिखाएंगे... जिसे देखकर आप कहेंगे कि जिंदगी को लेकर उनकी सोच इंसानों से कहीं बेहतर है. सबसे पहले आप शेर और Zebra के बीच लड़ाई की तस्वीरें देखिए. जंगल में एक शेर ने Zebra और जंगली भैंसों के झुंड पर हमला कर दिया . जानवरों का पीछा करते हुए शेर ने एक छोटे Zebra को दबोच लिया लेकिन तभी उस Zebra की मां वहां आ गई. पहले वो शेर पर हमला करने में हिचक रही थी लेकिन ममता की शक्ति से इस Zebra ने शेर के चंगुल से अपने बच्चे को छुड़ा लिया.

यहां तक कि एक चिड़िया भी अपने घोंसले और अंडे के लिए विशाल मशीनों के सामने डटकर खड़ी हो जाती है. एक किसान अपने खेत में Tractor लेकर पहुंचा लेकिन ये पक्षी अपने अंडों को सुरक्षा के लिए... Tractor के सामने से हटने को तैयार नहीं था. इसकी हिम्मत को देखकर किसान ने इसके घोंसले को सुरक्षित रहने दिया .

तीसरा वीडियो जंगल के सबसे चतुर शिकारी तेंदुए और एक छोटे जानवर Honey badger का है. यहां तेंदुए ने Honey Badger के एक बच्चे को अपना शिकार बनाने की कोशिश की. लेकिन उसकी मां ने तेंदुए पर हमला करके उसे दूर तक खदेड़ दिया . तेंदुए के मुकाबले Honey Badger की शक्ति और आकार दोनों कम हैं. लेकिन ये एक मां के ममता की ताकत है जिससे वो अपने से बड़े दुश्मन पर हमला करके अपने बच्चे को सुरक्षित रखती है.

माना जाता है कि जानवरों में इंसानों की तरह विचार करने की क्षमता नहीं होती है. वो हमारी तरह आसान और मुश्किल परिस्थितियों को ठीक से समझ नहीं पाते हैं. लेकिन ये तस्वीरें पशुओं की सोच और भावनाओं की अलग कहानी बताती हैं. कलियुग के माता पिता चाहें तो इन तस्वीरों से प्रेरणा ले सकते हैं. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आत्महत्या करने वाले ज्यादातर लोग अपने जीवन की समस्याओं से हार मान चुके होते हैं, उनके पास जीने का कोई कारण नहीं बचता. और उन्हें लगता है कि आत्महत्या से उनकी हर समस्या का समाधान हो जाएगा. इस पर हमने एक रिपोर्ट तैयार की है. इसे देखकर आपको इस समस्या के साथ समाधान की भी जानकारी मिलेगी जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है.

मरने वाला शख्स मरने से पहले इस बारे में किसी ना किसी से बात ज़रुर करता है. अगर कोई इंसान अचानक लोगों से बातचीत बंद कर दे, तो ये भी खतरे की घंटी है. कोई इंसान अपने सभी अधूरे काम निपटाने लगे तो उसके पीछे की वजह तलाशनी चाहिए. ऐसे लोगों से बात करना बेहद ज़रूरी है. कई बार तनाव के बोझ से दबे इंसान को सिर्फ किसी बात करने वाले की ज़रुरत होती है. फेसबुक और इंस्टाग्राम की वर्चुअल दुनिया में वक्त कम बिताया जाए और असल दुनिया में दोस्त बनाए जाएं तो मदद मिल सकती है.  

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दिल्ली के पास इंदिरापुरम में एक पूरा परिवार खत्म हो गया और पड़ोसियों को अंदाज़ा तक नहीं हुआ ये बात भी चिंताजनक है. अब उसी सोसायटी में ऐसा सोशल मीडिया ग्रुप बनाया गया हैं ताकी एक दूसरे से संपर्क बरकरार रह सके. बिखरते रिश्तों के इस भावुक विश्लेषण से हम यही सीख ले सकते हैं कि इन दूरियों को मिटाने की कोशिश आज ही अपने पड़ोस से शुरू करें. वैसे ये कोई पहली घटना नहीं है . इससे पहले वर्ष 2018 में दिल्ली में एक ही परिवार के 11 लोगों ने सामूहिक आत्महत्या की थी . जांच के बाद पता चला कि अंधविश्वास के चक्कर में इन सभी लोगों ने अपनी जान दे दी. तो क्या ये हमारे समाज का एक नया ट्रेंड बनता जा रहा है?

सनातन धर्म में तो ये माना जाता है कि करोड़ों योनियों के बाद मनुष्य योनि में जन्म मिलता है. और आत्महत्या करना इस दुर्लभ जीवन का अपमान है. गीता के एक श्लोक में कहा गया है कि समय से पहले खुद संसार छोड़कर जानेवाले बुद्धिहीन मनुष्य को ना तो इस लोक में और ना ही परलोक में जगह मिलती है. उन्हें कहीं सुख नहीं मिलता है. यानी आत्हमत्या करना एक तरह से जीवन की समस्याओं को पीठ दिखाना है. इसीलिए इसे कायरों का हथियार भी कहा जाता है.

अब आपको प्रेरणा देने वाली तस्वीरें दिखाते हैं: घर को अगर बच्चे का पहला स्कूल कहा जाता है तो परिवार को उम्मीद की पाठशाला कहना चाहिए. माता पिता बच्चों को ज़मीं पर पहला कदम रखने का हौसला देते हैं तो बड़ा होने पर सपनों की उड़ान भरना भी सिखाते हैं . हमारे देश में माता पिता और परिवार की यही पहचान है जो कई संपन्न देशों के पास भी नहीं है. क्योंकि पैसा सब कुछ नहीं होता है.

अच्छे विचार, रिश्ते और प्यार पैसों से नहीं खरीदे जा सकते . इसका सबसे बड़ा उदाहरण है सोमवार को World Cup के लिए चुनी गई अंडर 19 क्रिकेट टीम इसमें चुने गए 7 खिलाड़ी ऐसे हैं, जिनके पास गुज़ारे लायक पैसे भी नहीं थे . लेकिन परिवार के हौसले और अपने संघर्ष के बल पर वो टीम में अपनी जगह बनाने में सफल हुए हैं. टीम में शामिल इन खिलाड़ियों में से किसी के पिता किसान, किसी के फौजी हैं, कोई दूध बेचते हैं, तो किसी के अभिभावक ड्राइवर हैं. एक खिलाड़ी के पिता नहीं हैं, और उनकी मां मुंबई में बस कंडक्टर हैं. टीम के कैप्टन 18 वर्ष के प्रियम गर्ग साल 2011 में मां को खो चुके हैं. लेकिन निराश होने और डिप्रेशन में जाने की जगह इनके पिता ने ने इन्हें हौसला दिया.

प्रियम गर्ग के पास क्रिकेट किट खरीदने के भी पैसे नहीं थे... इसलिए उनके पिता नरेश गर्ग ने स्कूल बस चलाई... दूध बेचने का काम किया ताकि अपने बच्चे के सपनों को पूरा कर पाएं. ये सभी बच्चे बहुत गरीब परिवार से आते हैं. इनके पास अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी पैसे नहीं हैं. लेकिन इन बच्चों के माता-पिता ने इस निर्धनता के आगे हिम्मत नहीं हारी . इन्होंने ना खुद आत्महत्या की और ना ही अपने बच्चों की जान ली . बल्कि इन्होंने मुश्किलों और चुनौतियों का मुकाबला किया और अपने बच्चों का हौसला बढ़ाया और उनका साथ दिया . इसलिए आज इन बच्चों पर आज उन माता पिता के साथ साथ पूरा देश गर्व कर रहा है.

ऐसे उदाहरण आपके आस पास भी होंगे जो आपको जीवन जीने की प्रेरणा देंगे. अगर आप आज से ही ये सोचें कि आप कैसे किसी के लिए जीवन की प्रेरणा हो सकते हैं तो ये सकारात्मक सोच आपके आस पास के लोगों में भी सकारात्मक बदलाव लाएगी और आपको भी इस DNA विश्लेषण के बाद दुख का नहीं खुशी का अनुभव होगा.


(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from Zee News.)