Zee Jaankari: भारत और चीन की अनौपचारिक दोस्ती का विश्लेषण

Zee Jaankari: भारत और चीन की अनौपचारिक दोस्ती का विश्लेषण

आज हम सबसे पहले भारत और चीन की अनौपचारिक दोस्ती का विश्लेषण करेंगे. जिन दोस्तों के बीच औपचारिकता नहीं होती. उनकी दोस्ती लंबे समय तक चलती है. भारत और चीन की दोस्ती भी ऐसी ही है. आज से करीब 1500 वर्ष पहले भारत के एक महान बौद्ध भिक्षु बोधि-धर्म तलिमनाडु के रास्ते चीन गए थे. माना जाता है कि चीन के लोगों का बौद्ध धर्म से परिचय बोधि-धर्म ने ही कराया था. बोधि-धर्म कहते थे कि अगर हमें कोई बड़ा पुरस्कार मिलता है तो वो अतीत में किए गए कर्मों का ही फल होता है. भारत और चीन की कूटनीति भी अतीत के कर्मों पर आधारित है. जिसने दोनों देशों की दोस्ती के वर्तमान और भविष्य को पहले से भी मजबूत बना दिया है, लेकिन पिछले 50 वर्षों में हालात ने इसमें शंका के बीच बो दिए हैं.

आज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक मुलाकात करने के लिए चेन्नई पहुंचे. एयरपोर्ट पर उनका शानदार स्वागत हुआ और वहां उन्होंने भारत की महान संस्कृति की एक झलक देखी. इसके बाद सड़क के रास्ते वो चेन्नई से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित महाबलीपुरम पहुंचे. जहां प्रधानमंत्री मोदी तमिलनाडु की पारंपरिक पोशाक वेष्टी में शी जिनपिंग का इंतज़ार कर रहे थे. प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग का स्वागत किया उनसे काफी देर बातचीत की और फिर दोनों नेता अर्जुन तपस्या स्थल पर बने मंदिर को देखने पहुंचे.

अर्जुन तपस्या स्थल को UNESCO ने World Heritage Site यानी विश्व धरोहर का दर्जा दिया है. यहां की दो बड़ी-बड़ी चट्टानों पर पवित्र गंगा के धरती पर उतरने की कहानी को दर्शाया गया है. भारत की हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति को देखकर शी जिनपिंग पूरी तरह से मंत्रमुग्ध नजर आए. ऐसा माना जाता है कि चीन के लोग अपने चेहरे पर ज्यादा भाव नहीं लाते. चाहे वो खुशी महसूस कर रहे हो या फिर दुख. इसे पूर्वी एशिया की संस्कृति का हिस्सा माना जाता है. लेकिन आज महाबलीपुरम में भारतीय संस्कृति और इतिहास के दर्शन करते वक्त शी जिनपिंग के चेहरे पर उत्सुकता और कौतूहल के भाव साफ देखे जा सकते थे. क्योंकि वो प्रधानमंत्री मोदी की एक-एक बात बहुत ध्यान से सुन रहे थे, और अपने आस-पास की कलाकृतियों को समझने में रुचि भी ले रहे थे.

इसके बाद दोनों नेता पंच रथ मंदिर को देखने पहुंचे. ये भी UNESCO की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल है. यहां पांडवों और उनकी पत्नी द्रौपदी के रथों को चट्टानों पर उकेरा गया है. जिनके नाम धर्मराज रथ, अर्जुन रथ, भीम रथ, नकुल-सहदेव रथ और द्रौपदी रथ हैं. इसके बाद दोनों नेता स्मारक के प्रांगण में रखी कुर्सियों पर बैठे और काफी देर एक दूसरे से बातचीत की. इसी दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग को नारियल पानी दिया और नारियल पानी पीते-पीते दोनों नेताओं ने काफी देर तक एक दूसरे के साथ चर्चा की.

चट्टानों पर भारतीय संस्कृति के दर्शन करने वाले शी जिनपिंग ये बात अच्छी तरह समझ गए होंगे कि अगर उनके देश को चट्टान की तरह दुनिया के शक्तिशाली देशों का सामना करना है. तो उसकी नींव सिर्फ भारत ही तैयार कर सकता है. भारत और चीन की RockSolid दोस्ती वर्तमान World Order को बदल सकती है. यानी भारत और चीन मिलकर दुनिया के शक्ति संतुलन को एशिया के पक्ष में मोड़ सकते हैं और 21वीं सदी को एशिया की सदी बना सकते हैं. पंचरथ मंदिर घूमने के बाद दोनों नेता Shore Temple पहुंचे. Shore का हिंदी में अर्थ होता है तट या किनारा और ये मंदिर भी समुद्र तट पर स्थित है, यहां से बंगाल की खाड़ी दिखाई देती है. इसे दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग को पहले इस मंदिर के प्रांगण में घुमाया और उन्हें इसके ऐतिहासिक महत्व की जानकारी दी. दोनों नेता जब इस मंदिर में पहुंचे तो शाम होने लगी थी और ये मंदिर कृत्रिम रोशनी से जगमगाने लगा था.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नास्तिक हैं और वो भगवान में आस्था नहीं रखते. लेकिन हमें यकीन है कि भारत के मंदिरों और संस्कृति के दर्शन करने के बाद भारत और चीन की कूटनीति में उनकी आस्था ज़रूर मजबूत हो गई होगी. पाकिस्तान जैसे देश चीन को अपने पक्ष में लाने के लिए गरीबी, आतंकवाद, और डर का सहारा लेते हैं. जबकि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत किसी भी देश और उसके नेता को भारत का प्रशंसक बना सकती है. प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग को सिर्फ भारत की संस्कृति के दर्शन ही नहीं कराए बल्कि इस दौरान उन्होंने तमिलनाडु का पारंपरिक परिधान वेष्टी भी पहन रखा था. वेष्टी एक प्रकार की धोती होती है. जिसे आधी बाजू की गोल गले वाली शर्ट के साथ पहना जाता है. तमिलनाडु एक तटीय राज्य है. इसलिए वहां दिन के वक्त काफी उमस भी होती है और वेष्टी जैसे परिधान इस उमस से बचने में सहयोग करते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने तमिलनाडु की पारंपरिक पोशाक पहनकर ना सिर्फ शी जिनपिंग के सामने भारतीय संस्कृति का मान बढ़ाया बल्कि उन्होंने आज तमिलनाडु के लोगों का भी दिल जीत लिया. तमिलनाडु में वर्ष 2021 में चुनाव होने हैं और वहां बीजेपी को अपनी राजनीतिक जमीन भी मजबूत करनी है. ऐसा कहा जाता है कि करीब 1500 वर्ष पहले महान बौद्ध भिक्षु बोधि-धर्म ने तमिलनाडु के तट से ही अपनी चीन यात्रा की शुरुआत की थी और वो चीन के Guangzhou (ग्वांगज़ु) पहुंचे थे. शी जिनपिंग को इतिहास में बहुत ज्यादा रुचि है और इस अनौपचारिक मुलाकात के लिए महाबलीपुरम का चुनाव उनकी इसी रुचि को देखते हुए किया गया है.

पल्लव राजवंश ने छठी शताब्दी से लेकर नौवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत पर राज किया था. इस दौरान चीन और भारत के व्यापारिक संबंध बहुत मजबूत हो गए थे. इतिहास के जानकार मानते हैं कि पल्लव राजाओं ने चीन के कहने पर तिब्बत के विकास का भी ध्यान रखा था. और महाबलीपुरम में उस वक्त चीन के सिक्के भी स्वीकार किए जाते थे. शी जिनपिंग किसी वक्त चीन के फुजियान प्रांत के गवर्नर हुआ करते थे, और इस प्रांत के भी तमिलनाडु के साथ ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं. यानी आज शी जिनपिंग ने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में सिर्फ भारत की संस्कृति को ही नहीं समझा, बल्कि आज उन्हें अपने देश के इतिहास में भी झांकने का मौका मिला. आप इसे भारत का वो सांस्कृतिक आईना कह सकते हैं, जिसमें चीन को भी अपना अक्स नज़र आता है.

सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रखना भारत को भी आता है और चीन को भी. और ये देखकर दुनिया हैरान रह जाती है. दोनों ही देशों की वर्तमान आर्थिक स्थिती भी पूरी दुनिया के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है. दोनों देशों के पास कुल मिलाकर दुनिया की 36 प्रतिशत आबादी है. जबकि दोनों देश की ज़मीन को जोड़ लिया जाए तो ये दुनिया की 8 प्रतिशत ज़मीन हो जाएगी. चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है तो भारत इस मामले में फिलहाल छठे नंबर पर है. और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मिला लिया जाए तो ये 1150 लाख करोड़ हो जाती है. सेनाओं के आकार की बात की जाए तो चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना है जबकि इस मामले में भारत दूसरे नंबर पर है. इसलिए हम कह रहे हैं कि महाबलीपुरम में दुनिया के सिर्फ दो देशों के नेता नहीं मिल रहे थे बल्कि वहां दो महाबलियों का भी मिलन हो रहा था.

इतिहासकार Angus Maddison के मुताबिक पहली शताब्दी से लेकर सन 1820 तक दुनिया की कुल GDP में भारत और चीन की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से ज्यादा हुआ करती थी. ऐसा इसलिए था क्योंकि चीन और भारत उस वक्त तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थे. भारत और चीन कृषि प्रधान देश थे और इसका श्रेय तिब्बत के पठार को जाता है. तिब्बत के Glaciers से निकलने वाली नदियों ने भारत और चीन की सभ्यताओं को जन्म दिया और ये सभ्यताएं दुनिया की सबसे विकसित सभ्यताएं बन गईं. 15वीं शताब्दी के बाद से यूरोप के देशों ने भारत और चीन को उपनिवेश में बदलना शुरू कर दिया. ब्रिटेन और पुर्तगाल के व्यापारी समुद्र के रास्ते भारत आए और इन लोगों ने व्यापार के बहाने दोनों देशों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया.

यूरोप में जब औद्योगिक क्रांति का युग आया तब वहां उत्पादन बढ़ने लगा. वहां के मजदूर भारत और चीन के किसानों से ज्यादा समृद्ध हो गए. जबकि तकनीक के अभाव में भारत और चीन गरीब होते चले गए. इसके अलावा ब्रिटेन जैसे देशों ने भारत और चीन के सभी संसाधनों का भी जबरदस्त दोहन किया और विकसित तकनीक का फायदा उठाकर भारत और चीन को लगभग कंगाल कर दिया गया. विदेशियों ने हिंद महासागर के ज्यादातर रास्तों पर भी कब्ज़ा कर लिया. इसका असर ये हुआ कि भारत और चीन के पास संसाधनों की कमी हो गई. वर्ष 1952 आते-आते भारत और चीन की GDP दुनिया की GDP का 10 प्रतिशत भी नहीं थी.

चीन और भारत के बीच आज भी विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा हिंद महासागर ही है. चीन हिंद महासागर को घेरना चाहता है और भारत को ये मंजूर नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आज तमिलनाडु के समुद्री तट पर मिले. तमिलनाडु वो राज्य है जिसके तट पर हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का मिलन होता है. इसलिए इस मुलाकात के जरिए दोनों देशों के नेताओं ने दुनिया को ये संदेश देने की कोशिश की है कि जब दुनिया के बड़े-बड़े समुद्र और महासागर आपस में मिल सकते हैं तो भारत और चीन ऐसा क्यों नहीं कर सकते.


(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from Zee News.)