Zee Jaankari: देश के 20 करोड़ मुस्लिम भारत की अखंडता के रक्षक बन गए हैं

Zee Jaankari: देश के 20 करोड़ मुस्लिम भारत की अखंडता के रक्षक बन गए हैं

भगवान राम ने जब रावण का वध करने के बाद जब लंका पर विजय प्राप्त की थी, तब उनके भाई लक्ष्मण ने उनसे कहा था कि लंका इतनी सुंदर नगरी है..तो फिर इसे छोड़कर वापस अयोध्या क्यों जाना ? भगवान राम ने इसका उत्तर दिया और कहा- कि जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है, इसलिए हम कभी भी मातृभूमि का त्याग नहीं कर सकते . यानी मातृभूमि का सम्मान हमारे देश के DNA में है. और आज देश के मुसलमानों की एक बड़ी संस्था ने भी इसी भावना को चरितार्थ किया है. आज भारत के देशभक्त मुसलमान.. एक बार फिर से देश की अखंडता को बचाने के लिए दुश्मनों के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए हैं .

भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक संस्था....जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने आज़ाद भारत की सबसे बड़ी गलती को ठीक करने का काम किया है . इस संस्था ने जम्मू-कश्मीर को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया है. इस प्रस्ताव में कहा गया है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. और हर कश्मीरी भारत का नागरिक हैं . जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने ये भी कहा है कि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ये साबित करना चाहता है कि भारत के मुसलमान अपने ही देश के खिलाफ हैं . लेकिन भारत के मुसलमान पाकिस्तान को उसके इरादों में सफल नहीं होने देंगे.

पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर मुसलमानों को एक अलग पार्टी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा था. और हमारे देश के कुछ नेता और अंग्रेज़ी बोलने वाले Celebreties भी इससे खुश थे. लेकिन देश के मुसलमानों ने साफ कर दिया है कि वो भारत की एकता और अखंडता के पक्ष में हैं . और किसी भी पार्टी, देश, या अलगाववादी नेताओं को इस एकता को खंडित करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए .यहां आपको जमीयत उलेमा ए हिंद के बारे में भी जानना चाहिए . ये संस्था देवबंदी मुस्लिम विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है. इसकी स्थापना वर्ष 1919 में की गई थी .

और 1919 में शुरु हुए खिलाफत आंदोलन में भी इसकी बड़ी भूमिका थी . भारत के करीब एक करोड़ मुसलमान इसके सदस्य हैं और करोड़ों मुसलमान इस संस्था की बातों अनुसरण करते हैं. पाकिस्तान और हमारे देश के कुछ नेता कश्मीर को हिंदू और मुसलमानों के बीच विवाद का विषय बनाना चाहते हैं .

लेकिन आज उसी कश्मीर ने 135 करोड़ भारतीयों को एकता के सूत्र में बांध दिया है. धर्म के आधार पर वोट हासिल करने के लिए जो नेता पहले हिंदू और मुस्लिम कार्ड खेला करते थे..वो पिछले कुछ दिनों से कश्मीर कार्ड का इस्तेमाल करने लगे थे . इन नेताओं को ऐसा लगने लगा था जैसे उनकी बांटो और राज करो वाली राजनीति को नई संजीवनी मिल गई है . लेकिन अब देश के मुसलमानों ने ही इस विभाजनकारी राजनीति पर ब्रेक लगा दिया है.कल के अखबारों में आपके ये खबर शायद अंदर के पन्नों में दबी हुई मिलेगी , लेकिन आज हमने इस खबर को सबसे ज्यादा महत्व दिया है, क्योंकि ये खबर देश में आपसी भाई चारे को बढ़ाएगी. इतिहास इस बात का साक्षी है कि कश्मीर कभी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद का विषय था ही नहीं . बल्कि ये इलाका सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हुआ करता था .

लेकिन देश के कुछ नेताओं ने अपने राजनैतिक फायदे के लिए कश्मीर के नाम पर.. देश के लोगों को गुमराह किया और इसे हिंदू-मुसलमानो के बीच वर्चस्व की लड़ाई बना दिया .इतिहासकार मानते हैं कि 14वीं शताब्दी में कश्मीर में सूफी इस्लाम की परंपरा आगे बढ़ रही थी और तब यहां हिंदू पंडितों की संख्या भी काफी ज्यादा थी . कश्मीर..

गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल हुआ करता था .कश्मीर में हिंदू धर्म को मानने वाले और सूफी इस्लाम के अनुयायी मिल-जुलकर रहा करते थे . 19 वी सदी में जब अंग्रेज़ पहली बार कश्मीर पहुंचे तो वहां हिंदू और मुसलमानों की एकता देखकर दंग रह गए . दोनों धर्मों की संस्कृतियां आपस में इस कदर घुलमिल चुकी थीं, कि बांटों और राज करो की सोच रखने वाले अंग्रेज़ दुविधा में पड़ गए .

इस संस्कृति का अपना विशेष पहनावा और खानपान हुआ करता था . संस्कृतियों के इस महान संगम और इसकी विशेषता को ही कश्मीरियत कहा जाता है .लेकिन पहले अंग्रेज़ों ने ..और फिर कुछ नेताओं ने इस एकता को धार्मिक आधार पर तोड़ने की कोशिशें शुरू कर दी . इतिहासकार अशोक कुमार पांडे के मुताबिक कश्मीरी पंडित मुसलमानों के मुकाबले ज्यादा पढ़े लिखे हुआ करते थे .

कश्मीरी पंडितों को फारसी भाषा का भी अच्छा ज्ञान था . इसलिए प्रशासनिक पदों पर वो बड़ी संख्या में नियुक्त किए थे . तब इन्हें कारकून कहा जाता था . लेकिन अंग्रेज़ों ने जानबूझकर जम्मू-कश्मीर में ऊर्दू भाषा को बढ़ावा देना शुरू कर दिया . इसे सरकारी कामकाज की भाषा बनाया गया . इसके लिए यूपी और पंजाब से ऊर्दू जानने वाले लोगों को कश्मीर में नौकरियों पर रखा जाने लगा .

इसी दौरान कश्मीर में पहली बार बाहरी लोगों के प्रति नाराज़गी शुरू हुई . और आज़ादी के बाद नेताओं ने इस नाराज़गी को धार्मिक असहनशीलता का रूप देकर...हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने का काम शुरू कर दिया .कश्मीर के राजनीतिक और धार्मिक इतिहास की तह तक जाने की कोशिश कई लेखकों और इतिहासकारों ने की है .

लेकिन कश्मीर पर सबसे पुरानी और भरोसेमंद रचना..'राजतरंगिणी' को माना जाता है . जिसे कश्मीर के कवि कल्हण ने लिखा था .माना जाता है कि राजतरंगिणी की रचना वर्ष 1147 से 1149 के बीच की गई थी . इसमें कल्हण लिखते हैं कि कश्मीर घाटी पहले एक विशाल झील थी जिसे कश्यप ऋषि ने बारामुला की पहाड़ियां काटकर ख़ाली किया था.

राजतरंगिणी के अनुसार.. श्रीनगर शहर को सम्राट अशोक ने बसाया था और यहीं से बौद्ध धर्म पहले कश्मीर घाटी में और फिर मध्य एशिया, तिब्बत और चीन पहुंचा . कल्हण अपनी रचना में भारत पर महमूद गजनवी के आक्रमण और कश्मीर में इस्लाम की शुरुआत का भी उल्लेख करते हैं.यानी पौराणिक इतिहासकारों से लेकर आधुनिक इतिहासकार तक मानते हैं कि कश्मीर में हिंदू धर्म की जड़ें बहुत गहरी रही हैं . 14वीं शताब्दी में सूफीवाद कश्मीर पहुंचा . शुरुआत में वहां की हिंदू संस्कृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया . लेकिन बाद में धीरे धीरे हिंदुओं के धर्मांतरण की शुरुआत हो गई .

7वीं शताब्दी से लेकर 13वी शताब्दी तक कश्मीर पर कई हिंदू राजाओं का शासन रहा .इसके बाद सुल्तान शमसुद्दीन के वंशजों ने करीब 222 वर्षों तक कश्मीर पर राज किया . वर्ष 1757 में कश्मीर पर अफगान शासक अहमद शाह दुर्रानी ने कब्ज़ा कर लिया था .वर्ष 1819 में कश्मीर को महाराजा रणजीत सिंह ने जीत लिया और इसे सिख साम्राज्य का हिस्सा बना लिया . बाद में कश्मीर पर कब्ज़े को लेकर अंग्रेज़ों और सिख राजाओं के बीच युद्ध भी हुए .वर्ष 1846 में कश्मीर पर कब्ज़ा करने के बाद..अंग्रेज़ों ने इसे 75 लाख रुपये में गुलाब सिंह को बेच दिया जो डोगरा राजवंश के संस्थापक थे .

डोगरा राजवंश के ही आखिरी शासक.. महाराजा हरि सिंह थे . जिन्होंने 1947 में भारत के साथ विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे . ((जब कश्मीर भारत में शामिल हुआ तब वहां करीब 73 प्रतिशत मुस्लिम आबादी थी और 25 प्रतिशत हिंदू थे . यानी एक बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले राज्य पर एक हिंदू राजा का शासन था .

कुल मिलाकर...करीब 700 वर्षों में कश्मीर को गंगा-जमुनी संस्कृति के केंद्र से धर्म आधारित राजनीति का केंद्र बना दिया गया .यानी कश्मीर को राजनीतिक फायदों के लिए कभी खरीदा गया-कभी बेचा गया और कभी धर्म के आधार पर उसका बंटवारा कर दिया गया. वर्ष 1947 से ही कश्मीर पर गलतियों का ऐसा सिलसिला शुरु हुआ जिसका नतीजा आज भी पूरा देश भुगत रहा है.

 


(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from Zee News.)