नौ दिनों बाद क्यों खत्म हो जाएंगी लैंडर विक्रम की रही-सही उम्मीदें भी

नौ दिनों बाद क्यों खत्म हो जाएंगी लैंडर विक्रम की रही-सही उम्मीदें भी
सात सितंबर आर्बिटर से अलग होने के बाद जब लैंडर विक्रम चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला था. तब तो सबकुछ ठीक था लेकिन कुछ ही समय बाद लैंडर का संपर्क ऐसा टूटा कि अब तक टूटा ही हुआ है. लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल नौ दिनों बाद आने वाली है, जब चांद पर लंबी रात की शुरुआत होगी.

पूरे देश को मालूम है कि चंद्रयान-2 के आर्बिटर से जब लैंडर विक्रम अलग हुआ तो सब कुछ ठीक था. लेकिन जब वो चांद की सतह पर उतरने के लिए में था तभी उसका संपर्क इसरो के कंट्रोल रूम के साथ आर्बिटर से भी टूट गया. माना जाता है कि चांद की सतह से मुश्किल से 150 मीटर ऊपर ऐसा हुआ होगा.

तब लैंडर विक्रम को जिस स्पीड को कम करते हुए चांद पर उतरना था और अपने स्कैनर्स के जरिए उतरने की माकूल जगह तलाशनी थी, वैसा शायद वो नहीं कर पाया. माना जा रहा है कि वो चांद पर किसी बड़े गड्ढे में गिर चुका है.
दरअसल चांद का साउथ पोल ना केवल खासा उबड़-खाबड़ है बल्कि काफी हद तक अनजाना भी. उसके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी अभी किसी के पास नहीं है. उसके साउथ पोल के चित्रों को देखकर लगता है कि वो बड़े बड़े क्रेटर यानि गड्ढ़े और पहाड़ीनुमा संरचनाएं है. आर्बिटर ने उसकी जो तस्वीरें भेजी हैं, उसमें वो गिरा नजर आ रहा है. इस जानकारी के मिलने के बाद इसरो सक्रिय हो गया. उसने सिगनल्स भेजकर उसे हरकत में लाने के प्रयास शुरू कर दिए.

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इसरो के साथ साथ नासा भी इस काम में उसकी मदद कर रहा है. खबरों के अनुसार नासा की जेट प्रापुल्सन लैबोरेटरी उसे रेडियो फ्रीक्वेंसी से हैलो मैसेज भेज रही है. यानि पूरी कोशिश हो रही है कि अगर एक फीसदी भी लैंडर विक्रम को हरकत में लाया जा सके तो ऐसा किया जाए.
लैंडर विक्रम अभी निष्क्रिय है लेकिन उससे रेडियो फ्रीक्वेंसी के जरिए संपर्क साधने की कोशिश की जा रही है


क्या लैंडर से फिर संपर्क हो सकता है
लैंडर में ऐसे उपकरण हैं, जिससे धरती और आर्बिटर से उससे संपर्क साधा जा सकता है. लेकिन फिलहाल ऐसा लग रहा है कि लैंडर की पॉवर यूनिट फेल हो गई है और उसके पूरे सिस्टम ने काम बंद कर दिया है. हालांकि अब भी तक किसी को नहीं मालूम कि विक्रम की किस खामी के कारण संपर्क टूटा है.

क्या इस संपर्क की कोई सीमा भी है.
बिल्कुल जिस तरह हर चीज की एक डेडलाइन होती है, उसी तरह इसकी भी समयसीमा है. उसके बाद संभव है कि लैंडर विक्रम से कभी संपर्क नहीं किया जा सके. ये तभी होगा, जब वो पूरी तरह डेड व्यवहार करने लगे. हालांकि अब भी वो उसी व्यवहार कर रहा है लेकिन अभी वैज्ञानिकों को लग रहा है कि लैंडर में कुछ उपकरण ऐसे हैं, जिन्हें पृथ्वी से भेजे जा रहे रेडियो सिगनल्स का जवाब देना चाहिए.

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नौ दिनों बाद क्यों मुश्किल समय आ जाएगा.
सात सितंबर को जब लैंडर विक्रम चांद की सतह पर उतर रहा था. उसी दिन ये माना गया था कि चांद पर दिन की शुरुआत हुई है. अगर इसे सात सितंबर से शुरू माना जाए तो चांद पर 21 सितंबर तक लगातार दिन की स्थिति बनी रहेगी लेकिन 21 सितंबर के बाद रात शुरू हो जाएगी. ये रात ही लैंडर विक्रम के लिए असल संकट की घड़ी होगी यानि जो भी रही सही उम्मीदें भी हैं, वो इन रात की शुरुआत खत्म कर देगी. यहां ये जानना भी जरूरी है कि चांद का एक दिन पृथ्वी के 28 दिनों के बराबर होता है.

चांद पर अभी दिन चल रहे हैं लेकिन नौ दिनों बाद जब रात शुरू होगी तो लैंडर विक्रम पर संकट के असली बादल मंडराने लगेंगे


चांद पर रात आने से क्यों लैंडर की मुसीबत बढ़ेगी
-चांद पर रात होने का मतलब है कि लैंडर पर लगे सोलर पैनल काम नहीं करेंगे, जिससे इलैक्ट्रो मैग्नेटिव वेब के जरिए संपर्क नहीं किया जा सकेगा. ये तो एक स्थिति है लेकिन खतरनाक बात ये है कि चांद के साउथ पोल की रातें बहुत ठंडी होती हैं. इस दौरान यहां तापमान -200 डिग्री से नीचे चला जाएगा. जो लैंडर के लिए ऐसी संकट की घड़ी बनेगी, जो पूरी तरह से उसे ना निर्जीव कर देगी बल्कि उससे संपर्क की संभावनाओं पर फुलस्टॉप लगा देगी.

क्या इससे लैंडर की जिंदगी खत्म हो जाएगी
हां, ये कहा जा सकता है कि इससे लैंडर की जिंदगी पूरी तरह खत्म हो जाएगी. तब इसके काम करने को लेकर रही-सही उम्मीदें भी खत्म हो जाएंगी. -200 डिग्री तापमान एक एक करके उसके सारे उपकरणों को खराब कर देगा. तब उससे संपर्क होना असंभव की तरह होगा.

क्या आर्बिटर ऐसे कुछ मददगार हो सकता है
कहा जा रहा है कि अगर कोई सिगनल ज्यादा असरदार हो सकते हैं तो वो आर्बिटर का ही हो सकता है, क्योंकि वो लैंडर विक्रम के सबसे करीब से निकलता रहेगा. जब भी वो उसके करीब से गुजरेगा, तब उसको सिगनल भी भेजेगा.

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लैंडर या अंतरिक्ष में घूमती चीजों से कैसे संपर्क साधा जाता है
आमतौर पर अंतरिक्ष में विचरण कर रहे सैटेलाइट्स, यान से इलैक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों के जरिए संपर्क साधा जाता है. ये इतनी ताकतवर होती हैं कि पृथ्वी पर बैठकर मंगल ग्रह, चांद, या अंतरिक्ष में कहीं भी संपर्क साधा जा सकता है. ये तरंगें अंतरिक्ष में कितनी भी दूरी तरह पहुंचने की क्षमता रखती हैं. इन तरंगों को दो तरह के बैंड्स पर भेजी जाता है.
- एस बैंड यानि माइक्रोवेब
- एल बैंड यानि रेडियो वेब

चांद का दक्षिणी ध्रुव कहीं ज्यादा उबड़-खाबड़े क्रेटर से भरा है तो वहां की रातें बहुत ठंडी और भयंकर होती हैं


क्या अगर लैंडर चांद के उत्तरी ध्रुव पर उतरता तो बचा रहता
निश्चित तौर पर साउथ पोल की तुलना में चांद के नार्थ पोल पर हालात लैंडर विक्रम के लिए ज्यादा अनुकूल होते, क्योंकि वहां का मौसम ना तो उतना खतरनाक होता है और ना ही वहां की सतह उतनी उबड़-खाबड़ और क्रेटर से युक्त है. चांद पर यद्यपि सॉफ्ट लैंडिंग अब तक मुश्किल होती आई है लेकिन शायद उत्तरी ध्रुव पर अगर चंद्रयान-2 मिशन फोकस होता तो शायद लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग आसान होतीं और ये मिशन सफल हो सकता था.

चांद के साउथ पोल की क्या स्थिति है
चांद के उत्तरी पोल की तुलना में साउथ पोल पर स्थितियां कहीं मुश्किल हैं. ये भी कहा जाता है कि सूर्य की किरणें भी बहुत मुश्किल से चांद के इस होरिजन में पूरे तौर पर पहुंच पाती हैं. यानि कुछ उबड़-खाबड़ों की परछाइयां कभी खत्म नहीं होतीं. माना जाता है कि यहां बर्फ है, लिहाजा ये जगह पूरी दुनिया के लिए कौतुहल सी  है. ये भी कहा जाता है कि यहां के कुछ क्रेटर्रोंस में पानी हो सकता है. यहां लगातार सोलर विंड चलती हैं जो जमीन पर टकराती रहती हैं.

क्या दूसरे देश भी अपने मून मिशन को साउथ पोल पर फोकस कर रहे हैं
नासा और चीन भी इसी ध्रुव पुर अपना मिशन भेजने वाले हैं.

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(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from News 18.)