सिर्फ 20 फीसदी मामलों मे बचती है जान, जानें भारत में कैसे आया कांगो फीवर

सिर्फ 20 फीसदी मामलों मे बचती है जान, जानें भारत में कैसे आया कांगो फीवर
कांगो फीवर (Congo Fever) ने एक दशक बाद फिर वापसी की है. 2011 में इस फीवर की चपेट में आकर कुछ मौतें हुई थी. इस बार राजस्थान (Rajasthan) के जोधपुर और जैसलमेर में कांगो फीवर की वजह से दो मौतों की खबर आ रही है. गुजरात (Gujarat) में इसके फैलने की जानकारी है. राजस्थान की सरकार ने 134 लोगों के ब्लड सैंपल पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) में भेजी है.

एक टीम राजस्थानों के कई इलाकों में घूमकर बीमार लोगों का जायजा ले रही है. इस बीमारी से संक्रमित इलाके की पहचान की जा रही है. लोगों को इससे बचने के उपाय बताए जा रहे हैं.

क्या होता है कांगो फीवर?

क्रीमियन कांगो हेमरेजिक फीवर एक तरह का जानलेवा बुखार है. ये अफगानिस्तान और पाकिस्तान में कहर बरपा चुका है. इस वायरल इंफेक्शन से पीड़ित की 30 से लेकर 80 फीसदी मामलों में मौत हो जाती है. इस साल राजस्थान में इस फीवर की वजह से जोधपुर में 40 साल की एक महिला की मौत हो गई. 18 साल का एक युवक भी कांगो फीवर की चपेट में आकर मारा गया.कैसे फैलता है कांगो फीवर

कांगो हेमेरेजिक फीवर पशुओं में पाए जाने वाले पैरासाइट हिमोरल के जरिए इंसानों में फैलती है. ये जानवरों की खाल से चिपके रहने वाले पिस्सू जैसे कीड़े की वजह से फैलता है. कांगो फीवर के ज्यादातर मामले पश्चिमी और पूर्वी अफ्रीका में पाए जाते हैं. भारत में ये बीमारी पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आई है.

पाकिस्तान से लगती राजस्थान की सीमा के जरिए इस बीमारी का प्रवेश भारत में हुआ है. जानवरों से ये बीमारी इंसानों में फैलती है. इसलिए जानवरों की देखभाल या उसे पालने वाले लोगों को ये बीमारी होती है और इसका संक्रमण तेजी से फैलता है. इससे पीड़ित व्यक्ति के ब्लड या टिश्यू के कॉन्टैक्ट में आने से इसका संक्रमण फैल सकता है.
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कांगो फीवर पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भारत पहुंचा है


कैसी फैली बीमारी?

इस बीमारी की सबसे पहले क्रीमिया में दूसरे विश्वयुद्ध के आखिर में पहचान हुई. उस वक्त रुस के सैनिकों ने घर लौटकर खेती-बाड़ी शुरू कर दी थी. पहले इसका नाम क्रीमियन हेमरेजिक फीवर रखा गया. 1956 में इसके वायरस से पीड़ित कांगो के एक बच्चे की पहचान हुई. इसके बाद इसे कांगो फीवर का नाम मिला.

भारत में कैसे आई बीमारी

भारत में कांगो फीवर पड़ोसी देशों पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान से आई है. वैज्ञानिकों को लंबे वक्त से इसके वायरस के यहां होने की जानकारी थी. 1976 में इंडियन जनरल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने एक स्टडी छापी. जनरल में बताया गया कि 643 लोगों के सैंपल में 9 सैंपल इस वायरस से पीड़ित पाए गए. ये सैंपल केरल और पॉन्डिचेरी से लिए गए थे. महाराष्ट्र के जानवरों में इस बीमारी के वायरस मिले. 2011 में अहमदाबाद के अस्पताल स्टॉफ में भी इस बीमारी के वायरस मिले थे.

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कांगो फीवर जानवरों से इंसानों में पहुंचा है


कांगो फीवर के लक्षण

एक जानकारी के मुताबिक कांगो फीवर से पीड़ित हर तीसरे व्यक्ति की मौत हो जाती है. अगर बीमारी की पहचान शुरुआत में कर ली जाए तो पीड़ित को बचाया जा सकता है. इस फीवर से पीड़ित व्यक्ति के शरीर से खून आने लगता है. शरीर के महत्वपूर्ण अंग काम करना बंद कर देते हैं. पीड़ित व्यक्ति की मांसपेशियों में भयानक दर्द के साथ तेज बुखार आता है.

इसके अलावा सिर दर्द, चक्कर, रोशनी से चिड़चिड़ाहट और आंखों में जलन और पानी आने की शिकायत होती है. कांगो फीवर से पीड़ित व्यक्ति को उलटी आती है. गले में खराश और पीठ में दर्द की समस्या पैदा हो जाती है. इस बुखार में प्लेटलेट्स काउंट काफी तेजी से गिरने लगता है.

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(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from News 18.)