क्‍या है नागरिकता संशोधन बिल, जिस पर मचा है बवाल, बीजेपी को फायदा या नुकसान?

क्‍या है नागरिकता संशोधन बिल, जिस पर मचा है बवाल, बीजेपी को फायदा या नुकसान?
नई दिल्‍ली. गृहमंत्री अमित शाह  (Amit Shah) और असम के छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों व सिविल सोसायटी से दो दिन की बातचीत के बाद केंद्रीय कैबिनेट ने सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल (CAB) को बुधवार को पास कर दिया. सूत्रों के अनुसार इसे अगले सप्‍ताह संसद में लाया जाएगा.

क्‍या है सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल (CAB) Citizenship (Amendment) Bill, 2016?
ये विधेयक में मूल नागरिकता अधिनियम 1956 में संशोधन करने का प्रस्ताव है. इसके तहत बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान और अफगानिस्‍तान से आए उन गैर मुस्‍लिम शरणार्थियों जैसे हिंदू, जैन, क्रिश्‍चियन, सिख, बौद्ध और पारसियों को भारतीय नागरिकता देना है. जिन्‍हें अपने मूल देश को धार्मिक भेदभाव के कारण छोड़ना पड़ा हो. इस विधेयक में देश में रहने की अवधि 11 वर्ष से घटाकर 6 वर्ष करनी है. यानी ऐसे शरणार्थी जो पिछले 6 साल से भारत में रह रहे हैं, उन्‍हें भारत की नागरिकता दी जा सकेगी.

अगर ये बिल पास हो जाता है तो ऐसे शरणार्थियों को न ही जेल होगी और न ही उन्‍हें उनके देश वापस भेजा जाएगा. इसके लिए कट ऑफ डेट 31 दिसंबर 2014 रखी गई है. यानी इस तारीख से पहले या इस तारीख तक जो भी शरणार्थी भारत आए हैं, उन्‍हें यहां की नागरिकता दी जाएगी.इस बिल का इतना विरोध क्‍यों हो रहा है?
धर्म के आधार पर भेदभाव के कारण इस बिल का विरोध हो रहा है. आलोचकों का कहना है कि इस बिल को हिंदुओं को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है. विरोधियों का कहना है कि ये बिल संविधान के आर्टिकल 14 का उल्‍लंघन करता है जो लोगों को समानता का अधिकार देता है. ये बिल धर्म के आधार पर नागरिकता देता है.

नॉर्थ ईस्‍ट में ही क्‍यों हो रहा है इसका विरोध?
असम समझौता 1985 के समय अहम भूमिका निभाने वाले द आल असम स्‍टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने इस बिल के लिए सरकार की आलोचना की है. उसका कहना है कि उस समय राजीव गांधी और असम सरकार के बीच जो समझौता हुआ था, उसके हिसाब से सीएबी की कटऑफ डेट 24 मार्च 1971 रखी गई थी. लेकिन इस बिल में इसे बढ़ाकर दिसंबर 2014 कर दिया गया है. नॉर्थ ईस्‍ट में सिविल सोसायटी के कई प्रतिनिधियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात में इसी मुद्दे को उठाया. इस बिल के कारण शरणार्थियों की जनसंख्‍या के कारण इन राज्‍यों के मूल निवासी अल्‍पसंख्‍यक बन जाएंगे. अभी हाल में असम में एनआरसी लागू हुआ, यहां पर 19 लाख लोग इससे बाहर हो गए. इसलिए एनआरसी को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.

असम, मणिपुर, नगालैंड और मेघालय में इस बिल का विरोध 2016 में तब से चल रहा है, जब इसे पहली बार लाया गया था. अक्‍टूबर में अमित शाह ने मिजोरम का दौरा किया था, उस समय उन्‍होंने वहां विरोध करने वाले तमाम धड़ों से मुलाकात की थी.
अवैध प्रवासी कौन?
नागरिकता कानून, 1955 के मुताबिक अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती है. इस कानून के तहत उन लोगों को अवैध प्रवासी माना गया है, जो भारत में वैध यात्रा दस्तावेज जैसे पासपोर्ट और वीजा के बगैर घुस आए हों या फिर वैध दस्तावेज के साथ तो भारत में आए हों लेकिन उसमें उल्लिखित अवधि से ज्यादा समय तक यहां रुक जाएं.

बीजेपी को इस बिल से फायदा या नुकसान
बीजेपी में एक धड़ा जहां इसके समर्थन में है तो वहीं दूसरा पक्ष इसका विरोध भी कर रहा है. असम की बराक घाटी में इस बिल को खूब समर्थन मिल रहा है. यहां पर बांग्‍लाभाषी हिंदुओं की संख्‍या काफी है. असम गण परिषद जिसने एनआरसी का समर्थन किया था, इसके विरोध में है. यहां तक कि उसने सरकार से अपना समर्थन भी वापस ले लिया था. मणिपुर में जहां बीजेपी की सरकार है, वहां के मुख्‍यमंत्री एन विरेन सिंह इसको लेकर अपनी चिंताएं जता चुके हैं.

मेघालय में गठबंधन सरकार चल रही है. इस सरकार में बीजेपी भी शामिल है. सरकार में शामिल यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी और नेशनल पीपुल्‍स पार्टी (एनपीपी) इस बिल का विरोध कर चुकी हैं. वहीं नगालैंड सरकार भी इस बिल को लेकर अपनी चिंता जता चुकी है. वहीं ये बिल पश्‍चिम बंगाल में काफी अहम साबित हो सकता है. यहां पर हिंदू शरणार्थियों की बड़ी आबादी है जो इस बिल के समर्थन में हैं.

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(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from News 18.)