भारत-रूस संबंधों के पुनर्जागरण की संभावनाओं का सच

भारत-रूस संबंधों के पुनर्जागरण की संभावनाओं का सच

डॉ॰ विजय अग्रवाल - 


हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस माह के प्रथम सप्ताह की रूस की यात्रा को मुख्यतः इन दोनों देशों के बीच के ‘पुनर्जागरण के आरम्भ’ के रूप में व्याख्यायित एवं प्रचारित किया गया है. इस धारणा के केन्द्र में सबसे बड़ी बात आर्थिक भागीदारी को बढ़ाने की है, जिसे वर्तमान के मात्र दस अरब डॉलर से सन् 2025 तक बढ़ाकर तीन गुना यानी तीस अरब डॉलर किया जाना है.


क्या यह संभव है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह लक्ष्य आकाश में खिलाए जाने वाले रंगीन फूलों की तरह ही मनमोहक किन्तु अप्राप्य सा रह जाए?


इस सच की तलाश मैं पहले अपने नितांत ही निजी अनुभवों के आधार पर करना चाहूंगा. प्रधानमंत्री की ब्लादिवोस्तोक की यात्रा के ठीक एक सप्ताह पहले मैं रूस में था और वहां एक सप्ताह रहा. अपनी अल्हड़ अवस्था में ही मार्क्सवाद के रोमानीपन ने रूस से मेरा एक अलग ही तरह का नाता बना दिया था. वहां मैं मात्र इस रिश्ते के सच का अनुभव करने गया था. मेरी आंखें और मेरे कान वहां पंडित जवाहरलाल नेहरू और अपने फिल्मकार राजकपूर को देखने और सुनने को तरसते रह गए. यह बताने पर भी कि ‘मैं भारत से हूं’ रूस के किसी भी नागरिक की आंखों की रंगत में मुझे तनिक भी बदलाव नजर नहीं आया. यहां तक कि सात दिनों तक मेरे साथ रही मेरी अंग्रेजीभाषी गाइड तक ने इस बीच एक बार भी न तो भारत के बारे में कुछ पूछा और न ही अपनी ओर से कुछ बताया.

कभी ऐसा रहा होगा कि राजकपूर के गाने वहां की गलियों-गलियों में गूंजते रहे हों. लेकिन अब वहां सन्नाटा है. आप कह सकते हैं कि फिलहाल मौन हो गए उन कंठों को ही फिर से जगाने की कोशिश हो रही है, जिसे हम ‘पुनर्जागरण’ कह रहे हैं.


लेकिन क्या ऐसा कर पाना इतना आसान होगा, विशेषकर तब, जब चीनी ड्रैगन रूस की देह पर स्पष्ट रूप से चारों ओर लिपटता नज़र आ रहा है. रूस में मैं जहां-जहां गया, पर्यटकों के रूप में चीन के लोगों की बाढ़ नजर आई. भारतीय एक भी नहीं मिला. यहां तक कि पर्यटक स्थलों पर चीनी भाषा में निर्देश तक लिखे हुए थे. वहां अंग्रेजी नहीं थी. हिन्दी का तो नामोनिशान देखने को नहीं मिला.


मॉस्को से 615 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रूस के दूसरे महत्वपूर्ण शहर पिट्सबर्ग आप ट्रेन से चार घंटे में पहुंच जाते हैं. वहां तो बाकायदा चीनी लोगों के अपने अपार्टमेंट्स के बड़े-बड़े परिसर हैं, बड़े-बड़े मॉल और उनके अपने अस्पताल हैं. रूस की दुकानें चाइनीज सामानों से पटी पड़ी हैं. वहां भारतीय सामान आपको माइक्रोस्कोप से ढूंढने पर ही नजर आएगा.

यह तो हुई रूस-भारत और चीन की रूस में स्थिति पर बात. अब यदि पूरी दुनिया की स्थिति पर नज़र डालें, तो यह साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि जैसे-जैसे अमेरिका और चीन के बीच व्यापार-युद्ध तीखा होता जा रहा है, वैसे-वैसे चीन रूस के और करीब जाता जा रहा है. वैसे भी ये दोनों कम्युनिस्ट विचारधारा के रहे हैं और दोनों देशों की सीमाएं गलबहियां डाले हुए हैं.


दूसरी ओर अमेरिका और पश्चिम यूरोपीय देशों के प्रति भारत के झुकाव ने रूस के साथ अत्यंत विश्वसनीय तथा पुराने-घनिष्ठ संबंधों में कहीं न कहीं खटास तो पैदा कर ही दी है.


सन् 2000 में रूस के राष्ट्रपति पुतिन जब भारत आए थे, तब दोनों देशों के बीच जो रणनीतिक साझेदारी की गई थी, उसमें राजनीति, रक्षा, नागरिक परमाणु ऊर्जा, आतंकवाद विरोधी सहयोग तथा अंतरिक्ष के परम्परागत विषयों में आर्थिक तत्व को भी शामिल किया गया था. इसके तीन साल बाद हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब रूस गए, तब उनके साथ, जैसा कि वाजपेयी जी ने स्वयं कहा था, ‘ए स्ट्रॉन्ग बिजनेस डेलिगेशन‘ भी गया था. वह डेलिगेशन आर्थिक मोर्चे पर अब तक कुछ खास नही कर पाया. इस बार भी प्रधानमंत्री के साथ एक स्ट्रॉन्ग बिजनेस डेलिगेशन गया था. देखें कि वह क्या कमाल दिखा पाता है. वैसे भी रूस के जिस सुदूर पूर्वी क्षेत्र पर जो आशाएं टिकाई गई हैं, उसकी आबादी एक करोड़ से भी बीस लाख कम है.


तब से अब तक की ‘आर्थिक यात्रा‘ के परिणाम 30 अरब डॉलर के प्रति विशेष आशा नहीं जगाते. न तो अतीत इसकी गवाही देता हुआ नजर आता है, और न ही भविष्य समर्थन करता हुआ. हां, हो जाए, तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है! जापान की आबादी रूस से दो करोड़ कम है. लेकिन इस साल भारत के साथ उसका व्यापार पचास अरब डॉलर का होने की उम्मीद है. तो फिलहाल कुछ ऐसी ही उम्मीद रूस के साथ के व्यापार में करने में आाखिर हर्ज ही क्या है.


(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from News 18.)