कटेंगे तो और जलेंगे जंगल! जानें मुंबई का बवाल कैसे है ग्लोबल चिंता का सवाल

कटेंगे तो और जलेंगे जंगल! जानें मुंबई का बवाल कैसे है ग्लोबल चिंता का सवाल
'आप हमें छल रहे हैं, लेकिन हम नौनिहालों (Youth Population) को आपका कपट समझ में आने लगा है... मुझे कहना है कि हम आपको कभी माफ नहीं करेंगे.' पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के मंच से 15 साल की ग्रेटा (Greta Thunberg) की ये आवाज़ अभी आप भूले नहीं होंगे. भारत (India) समेत दुनिया भर में जंगल (Forest Fire) जलने से लेकर मुंबई में जंगल कटने तक की नौबत के बीच इस आवाज़ के साथ आंकड़े (Statistics) भी कुछ कह रहे हैं, आपने सुना?

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आरे में मेट्रो कारशेड (Mumbai Metro) के लिए मुंबई के फेफड़े कहे जाने वाले इलाके में हज़ारों पेड़ काटे जाने (Trees Hacking) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन क्या कहते हैं? पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के उस मंच से ग्रेटा थनबर्ग की आवाज़ गूंजी, जिस मंच से दुनिया भर के नेताओं ने वादे क्लाइमेट (Climate Change) के लिए वादे किए थे. अमेज़न (Amazon Rain forests) के जंगलों की आग के बारे में भी हाल में आप सुन चुके हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत के जंगल कैसे और किस कदर जल रहे हैं?

ज़रूरी जानकारियों, सूचनाओं और दिलचस्प सवालों के जवाब देती और खबरों के लिए क्लिक करें नॉलेज@न्यूज़18 हिंदीजल रहे हैं भारत के फेफड़े
स्टेट ऑफ एन्वायरनमेंट की 2019 की रिपोर्ट की मानें तो 2001 से 2018 के बीच भारत ने 17.6 लाख हेक्टेयर की हरियाली हर साल खो रही है. जंगलों में लगने वाली आग से हर साल भारत को 1176 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. पिछली तकनीक से जो रिकॉर्ड हासिल हुए थे, उनकी तुलना में साढ़े 9 गुना ज़्यादा जंगल की आग बढ़ गई है. ये आंकड़े भी अगर आपको नहीं चौंका रहे हैं, तो और देखिए कि हम कितनी तेज़ रफ्तार से मौत की तरफ बढ़ने पर आमादा हैं.

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ओर कॉलोनी के पेड़ों के काटने के खिलाफ नौजवानों के पेड़ों से लिपटकर रोने की तस्वीरें सामने आई थीं.
इस साल जनवरी और फरवरी सिर्फ दो महीनों में जंगल में आग की कुल 558 छोटी बड़ी घटनाओं में से 209 सिर्फ पांच दक्षिणी राज्यों में घटीं. तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में ये हादसे 217 से 401 फीसदी तक बढ़ चुके हैं लेकिन यहां जंगल की आग पर काबू पाने के लिए जारी फंड का इस्तेमाल 60 फीसदी से ज़्यादा नहीं हो सका!

ग्लोबल वॉर्मिंग से सबसे ज़्यादा प्रभावित है भारत
दुनिया के जिन देशों में क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे खराब असर पड़ने के अनुमान हैं, उनमें भारत का नाम शामिल है. वेदर नाम के पोर्टल की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में क्लाइमेट चेंज के गंभीर खतरों की ज़द में जो इलाके हैं, उनमें करीब 15 करोड़ की आबादी बस रही है. हालांकि भारत क्लाइमेट चेंज पर हुए पेरिस समझौते के मुताबिक कई वादे निभा रहा है लेकिन विशेषज्ञ कह रहे हैं कि करोड़ों की आबादी को बचाने के लिए इतना काफी नहीं है. बड़े कदम उठाने ही होंगे.

ये थे नेताओं के हालिया वादे
संयुक्त राष्ट्र के मंच से क्लाइमेट चेंज पर हुई परिचर्चा के दौरान भारत ने रीन्यूएबल एनर्जी के इस्तेमाल को लेकर और ज़्यादा काम करने का वादा मुख्य तौर पर किया. साथ ही, प्लास्टिक के खिलाफ अभियान छेड़ने का इरादा भी. दुनिया के कई देशों ने पर्यावरण के हित में जो वादे किए वो संयुक्त राष्ट्र 10 वर्षीय क्लाइमेट एक्शन प्लान के तहत समझे जा सकते हैं.

2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 45 फीसदी तक कम कर रीन्यूएबल एनर्जी से 80 फीसदी बिजली उत्पादन का पक्का इरादा. 2025 तक इस तरह 40 फीसदी बिजली उत्पादन का वादा. यूएन सचिवालय ने इरादा ज़ाहिर किया कि 2025 तक प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 25 फीसदी और प्रति व्यक्ति बिजली खपत को 20 फीसदी तक कम किया जाएगा.


पेड़ ही तो हैं सुरक्षा कवच
विज्ञान की थोड़ी सी समझ काफी है ये समझने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की समस्या पर काबू पाने के लिए पेड़ कितने कारगर हैं. ये कार्बनडाइ ऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीजन देते हैं, जिससे कार्बन फुटप्रिंट और ग्रीनहाउस गैसों की समस्या कुदरती तौर पर हल होती चलती है. लेकिन, दुनिया में कई जगह विकास के नाम पर पेड़ काटने और जंगलों के जलने का सिलसिला जारी है.

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इसी साल हाल में, अमेज़न के जंगलों की भीषण आग सुर्खियों में थी.


अमेज़न के बाद आरे को ऐसे समझें
ब्राज़ील की सीमा में आने वाले अमेज़न जंगल को दुनिया का फेफड़ा कहा जाता है लेकिन अगस्त में यहां जो भयानक आग लगने की घटना हुई, उसके बाद ब्राज़ील के शीर्ष नेताओं ने मीडिया पर ज़रूरत से ज़्यादा कवरेज करने और हादसे को बढ़ा चढ़ाकर बताने का आरोप लगाकर इस घटना को एक तरह से रूटीन करार दे दिया और ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया. अमेज़न के रेनफॉरेस्ट को लेकर जो आंकड़े सामने आए, उन्हें समझें.

नासा ने सितंबर में कहा कि जनवरी से अगस्त 2019 के बीच ब्राज़ील के जंंगलों में पिछले साल के इन्हीं महीनों की तुलना में 39 फीसदी ज़्यादा अग्निकांड हुए. द हिंदू की एक रिपोर्ट में लिखा गया कि अमेज़न की आग को मनुष्यों के विकास का नतीजा कहना चाहिए. पिछले कुछ दशकों में जितने पेड़ काटे गए हैं, उन्हीं का एक भयानक नतीजा है कि जंगल अब इस कदर झुलसने लगे हैं.


तो कैसे जलेगी या बहेगी मुंबई?
मुंबई के आरे इलाके के जंगल से हज़ारों पेड़ काटे जाने के सिलसिले के बीच लोग सड़कों पर उतर आए हैं. लता मंगेशकर, रवीना टंडन जैसे सेलिब्रिटीज़ इस कदम का विरोध कर रहे हैं. वहीं, न्यूज़18 ने ही एक रिपोर्ट में पर्यावरणविदों के हवाले से बताया जा चुका है कि इन पेड़ों की वजह से बारिश का पानी रुकता है. अगर पेड़ नहीं होंगे तो बारिश का अतिरिक्त पानी मीठी नदी में जाएगा और इससे मुंबई के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास के इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा होगा.

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मुंबई में आरे कॉलोनी के उन पेड़ों को बचाने लोग सड़कों पर उतरे, जिन्हें कोर्ट ने जंगल नहीं माना.


अमेज़न के सबक देखें तो मुंबई समेत भारत में जंगलों के जलने के हादसे और भयानक होने की पूरी आशंका होगी ही. इसके बावजूद हो ये रहा है कि आरे में धारा 144 लगा दी गई है और अमेज़न जंगल में आग को पूरी मानवता का नुकसान बताने वाला मुंबई पुलिस का ट्विटर हैंडल आरे के मुद्दे पर चुप है. पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कह चुके हैं कि दिल्ली में मेट्रो बनी थी, तब भी पेड़ काटे गए थे. लेकिन काटे गए पेड़ों के बदले पेड़ लगाए गए थे. यही मंत्र है विकास भी, पर्यावरण सुरक्षा भी.

विकास का मंत्र है या विकास की कीमत?
वर्ल्डवाइड फंड की ​एक रिपोर्ट में कहा गया था हम हर दिन करीब सवा लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बराबर जंगल हर दिन खो रहे हैं और यही रफ्तार रही है तो एक और अध्ययन के मुताबिक 2050 तक दुनिया से भारत के नक्शे के बराबर जंगल खत्म हो जाएगा. अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में पिछले कुछ सालों में आर्थिक विकास के चक्कर में जंगलों की कटाई ज़ोरों पर हुई है. सरकारी आंकड़ा ही कहता है कि पिछले 30 सालों में 23700 से ज़्यादा उद्योगों के लिए 14 हज़ार वर्ग किलोमीटर का जंगल तबाह कर दिया गया.

भारत में जंगल के कानूनों को लेकर मुद्दे बेहद उलझे हुए हैं. आदिवासियों के अधिकार, जंगल सुरक्षा और तस्करी से जुड़े कई मोर्चों पर देश लगातार समस्याओं से जूझ रहा है और ऐसे में किसी विकास या उद्योग के लिए आरे जैसे ग्रीन ज़ोन में हज़ारों पेड़ काटे जाने का मतलब लोग समझ रहे हैं इसलिए इसके विरोध में उतर चुके हैं और पूरी दुनिया को शर्मिंदा करने वाली ग्रेटा के शब्दों में कहना चाहते हैं कि 'हम आपको माफ नहीं करेंगे'.

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कई अनूठी प्रजातियों का घर है मुंबई स्थित आरे का जंगल.


आरे के लिए क्यों नहीं मिलेगी माफी?
चेंज.ओआरजी पर आरे के पेड़ों को बचाने के लिए हस्ताक्षर याचिका अभियान महीनों से चल रहा है, जबसे कोर्ट में केस गया था. इस पोर्टल पर उल्लेख है कि आरे का जंगल चिड़ियों की 78, ति​तलियों की 80, स्तनधारियों की 16 और तेंदुओं की 9 प्रजातियों का घर है. ये भी कि एक कार 80 किलोमीटर चलकर जितनी कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा करती है, यानी 20 किलो तक एक पेड़ सोख लेता है. एक बड़ा पेड़ हर दिन चार लोगों के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन दे सकता है. इन आंकड़ों को सबूत बताकर यहां प्रशासन के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है.

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(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from News 18.)