पंकज कपूरः एक ऐसा शख्स जिसके बचपन ने तय कर दिया कि वो 'एक्टर' ही बनेगा

पंकज कपूरः एक ऐसा शख्स जिसके बचपन ने तय कर दिया कि वो 'एक्टर' ही बनेगा
पंकज कपूर. 80 के दशक में आधा हिंदुस्तान उन्हें करमचंद के नाम से जानता था और आधा मुसद्दी लाल या फिर बुधई के नाम से. 90 के दशक में फिल्म एक डॉक्टर की मौत से उन्हें डॉ. दीपांकर रॉय के किरदार ने पहचान दिलाई. अगला दशक फिल्म मकबूल में अब्बा जी के किरदार का था. औसत कदकाठी और औसत चेहरे के बाद भी पंकज कपूर छोटे और बड़े परदे पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे. पंकज कपूर का जन्म लुधियाना में हुआ था. अभिनय यानी हल्के-फुल्के ड्रामे की शुरूआत उनकी मां ने ही कराई. पिता जी ने ‘स्पीचेस’ वगैरह की तैयारी कराई. लिहाजा स्कूल के दिनों से ही ड्रामा जैसी गतिविधियों में उनका दखल रहता था.

इस दखल की कहानी पंकज बताते हैं- ‘मेरे पिता आनंद प्रकाश कपूर डबल एमए थे. उन्होंने अंग्रेजी और इतिहास दोनों से एमए किया था. वो लुधियाना के आर्या कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे. बाद में वो वहीं से प्रिसिंपल की जिम्मेदारी से रिटायर हुए. वो कमाल के इंसान थे. बहुत कमाल का लिखते भी थे. लेकिन तपस्वी इंसान थे. उन्होंने अपना ज्यादा ध्यान अपनी तपस्या की तरफ रखा. मेरी मां का नाम था कुमुद कपूर. वो घरेलू महिला थीं. पढ़ी लिखी थीं लिहाजा उन्हें भी आर्ट्स से जुड़ी तमाम चीजों का शौक था. उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था. उपन्यास खूब पढ़ती थीं. मेरे माता-पिता बड़े काबिल लोग थे. बावजूद इसके बेहद सामान्य तरीके से रहते थे. वो बचपन में जो मुझे नाटक कराती थीं, उसका मकसद भी यही था कि हम लोग ‘बिजी’ रहें. शायद उनका अपना शौक भी पूरा होता रहा होगा. पिता जी अंग्रेजी सिखाते थे, पढ़ाते थे और उसके बारे में बताते भी थे. पिता जी मुझे बचपन में कहानियां बहुत सुनाते थे. शेक्सपीयर से लेकर शरलाक होम्स तक की कहानियां उन्होंने मुझे बचपन में सुनाई हैं.’


ये पचास के दशक की बात है. उस जमाने में लुधियाना छोटा सा शहर था. अब तो बहुत बड़ा हो गया है. उस समय वहां एक शांति का अहसास था. खामोशी का अहसास था. पंकज कहते हैं- ‘छोटे शहरों की जो अच्छाइयां होती हैं उन सबके साथ मेरा वहां बचपन गुजरा है. एक मोहल्ला था. लोग थे. दोस्त यार थे. बड़ा ही मासूम सा माहौल था जिसमें मैं पला बढ़ा हूं. देश को आजादी मिले भी ज्यादा वक्त नहीं बीता था. समाज धीरे-धीरे ‘मेच्योर’ हो रहा था. आगे बढ़ रहा था. उसमें तब्दीलियां हो रही थीं. उस जमाने में टेलीविजन नहीं था. टेलीफोन और इंटरनेट जैसी चीजों का तो खैर सवाल ही नहीं था. रेडियो भी हर घर में नहीं था. उस वक्त मेरी उम्र 6-7 साल से ज्यादा की नहीं थी. वो बाकायदा इन कहानियों और किरदारों के बारे में हमें अनुवाद करके बताया करते थे. इस तरह का था बचपन हमारा. छोटा-सा किचन था हमारा उसमें पकौड़े भी बन रहे होते थे और साथ-साथ ये कहानियां भी चल रही होती थीं.’

इन कहानियों के बीच क्या शैतानी का कोई ‘स्कोप’ था? इस सवाल के जवाब में पंकज अपने बचपन की पिटाई का किस्सा बताते हैं- यूं तो मैं बचपन में भी शरारती नहीं था. मतलब शरारत की भी तो पतंगबाजी की. उसके अलावा मुझे याद नहीं आता कि मेरी कोई ऐसी बदमाशी रही हो. एक बार पतंगबाजी के चक्कर में पिटाई जरूर हुई थी. हुआ यूं कि एक बार हम घर पर खबर किए बिना मांझा सूतवाने चले गए थे. ऐसा हमने पहले भी किया था लेकिन उस रोज घर में हमारी खोज मची होगी. जब हम मांझा सूतवा कर लौटे तो हमारी भी सुताई हुई. मतलब उस समय हालत ऐसी थी कि पिता जी का देख लेना भर हमारे लिए काफी होता था लेकिन उस दिन डांट पड़ी और एकाध चपैट भी पड़ गई. बाकी बदमाशियां करने का मुझे मौका ही नहीं मिला.’पिता जी के टीचर होने का क्या कोई फायदा हुआ, पंकज कहते हैं-

मुझे ऐसा तो नहीं लगता कि किसी टीचर ने मुझे इसलिए ‘एक्स्ट्रा’ नंबर दिए हों कि मैं थिएटर करता था या ‘डिबेट’ में ‘पार्टिसिपेट’ करता था. मुझे इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी क्योंकि इम्तिहान में पास हो जाने भर का सिलसिला मेरा था. फिर भी मुझे इतना अच्छे से याद है कि नाटक, डिबेट जैसी गतिविधियों में भाग लेने की वजह से एक दो टीचर मेरे प्रति काफी मेहरबान रहते थे. वो लोग इस बात के लिए हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाते थे कि अगर एक बच्चा इन गतिविधियों में ‘एक्टिव’ है तो उसे करने दिया जाए.


यानी किसी ने कभी इस बात को लेकर नहीं टोका कि पढ़ाई कर लो आगे पढ़ाई ही काम आएगी, ये नाटक से कुछ हासिल नहीं होगा. ना तो स्कूल में ऐसी टोकाटाकी हुई, ना ही कॉलेज में. इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि सबको पता था कि मेरे पिता खुद ही टीचर हैं. शायद, उन्हें लगता रहा होगा कि जब पिता जी नहीं टोकते तो फिर वो मुझे क्यों टोकें.’
पंकज कपूर की कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब उन्होंने तय किया कि वो अभिनय करेंगे. मां-बाप ने बढ़ावा तो दिया था लेकिन पंकज उसी में अपना करियर तलाशने लगेंगे इसकी उम्मीद उन्हें नहीं थी. उस रोज की कहानी तो पंकज को अब भी याद है जब उन्होंने पहली बार कहा था कि वो अभिनय करेंगे- ‘हुआ यूं कि जब मैं दस-बारह साल का था तब मैंने तय कर लिया था कि मुझे एक्टिंग करनी है. यह अलग बात है कि इस उम्र में ना तो कोई अपनी बात किसी से कहता है और ना ही उसे ‘सीरियसली’ लिया जाता है. जब मैं 18 साल का हुआ तो मैंने ये बात अपनी मां को बताई. मां बहुत रोईं. अगली सुबह उन्होंने पिता जी को नाश्ते की टेबल पर बता दिया कि भाई ये लड़का तो कह रहा है कि ये अभिनेता बनना चाहता है और उसके लिए भाग जाएगा. मुझे लगा कि आज मेरी बहुत पिटाई होगी. लेकिन चूंकि वो बहुत ही कमाल के इंसान थे. उनमें इंसान की सोच समझ की बारीक पकड़ थी. उन्होंने कहा कि कि मुझे बहुत खुशी है कि मेरे बच्चे ने 18 साल की उम्र में ये तय कर लिया कि वो क्या करना चाहता है. उन्होंने मुझसे मुखातिब होकर कहा-क्या वाकई तुम्हारे अंदर काबिलियत है, माद्दा है इस चीज को आगे बढ़ाने का? और अगर है तो इसमें तालीम हासिल करो.’

(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from News 18.)