जानिए पुनर्जन्म पर क्या बोले सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने जज

जानिए पुनर्जन्म पर क्या बोले सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने जज
आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के जज (judge) सार्वजनिक समारोहों में बोलने से बचते हैं. अगर बोलते भी हैं तो बहुत सधा हुआ और संतुलित. खासतौर पर सुप्रीम कोर्ट के सीटिंग जज पब्लिक फंक्शन (public function) में पेचीदे मसलों पर बोलने से बचते हैं. लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज रोहिंटन फली नरीमन ने सबको हैरान कर दिया है.

दिल्ली में डॉ एलएम सिंघवी मेमोरियल लेक्चर में उन्होंने 45 मिनट का भाषण दिया. वो भी पुर्नजन्म और कर्म जैसे जटिल विषय पर. जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन बिना किसी तैयारी के, बिना किसी कागज के टुकड़े की मदद के लगातार बोलते रहे. ये जस्टिस फली नरीमन का एक जटिल विषय पर जोरदार भाषण था. उन्होंने पाइथागोरस से लेकर प्लेटो और चीनी फिलॉस्फर कंफ्यूसियस से लेकर लाओ त्जु पर बोले. विभिन्न काल और वक्त में पूर्वी और पश्चिमी सभ्यताओं के बारे में बताया. जैनिज्म और बुद्धिज्म में पुर्नजन्म को कैसे पारिभाषित किया गया है, इसके बारे में बताया.

पुनर्जन्म पर बोले सुप्रीम कोर्ट के जज

पुनर्जन्म की अवधारणा पर बात करते हुए रोहिंटन फली नरीमन ने बताया कि ईसापूर्व चौथी और पांचवी सदी में 6 बेहतरीन फिलॉस्फर हुए. इनमें से दो ग्रीस से थे, दो भारत से और दो चीन से. इन छह में से चार दार्शनिकों ने पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार किया. दो चीनी दार्शनिकों ने इसे अस्वीकार कर दिया.रोहिंटन फली नरीमन ने पाइथागोरस का उदाहरण दिया है. उन्होंने कहा कि पाइथागोरस को हम सिर्फ उनके दिए थ्योरम के लिए जानते हैं. जबकि वो एक महान दार्शनिक थे. फली नरीमन ने बताया कि पाइथागोरस शाकाहारी व्यक्ति थे और उन्हें पुनर्जन्म में भरोसा था. उनके बारे में कई किस्से प्रचलित हैं. मसलन वो किसी को भी कुत्ते को मारने से रोकते थे और कहते थे कि कुत्ते में उन्हें अपना मरा हुआ दोस्त दिखता है. पाइथागोरस के मुताबिक पुनर्जन्म सिर्फ इंसानों में ही नहीं बल्कि जानवरों और पौधों में भी होती है.

justice rohinton fali nariman speech on incarnation and karma in different religion and philosophy
पुनर्जन्म को लेकर अलग-अलग बातें होती रही हैं


प्लेटो ने भी मानी थी पुनर्जन्म की बात
रोहिंटन फली नरीमन ने बताया कि इसी तरह से ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने भी पुनर्जन्म की अवधारणा को अपनी दो किताबों के जरिए माना था. प्लेटो की लिखी किताब रिपब्लिक में इसका जिक्र मिलता है. प्लेटो ने रिपब्लिक में ईआर नाऊ नाम के शख्स का जिक्र करते हैं. ईआर अपने शरीर को छोड़कर 12 दिनों के लिए ट्रांस में चला जाता है. 12 दिन बाद अपने शरीर में वापस लौटने के बाद वो स्वर्ग और नर्क की कहानियां बताता है, जहां से वो होकर आया होता है. शायद इसी कहानी के आधार पर सदियों बाद दांते ने मशहूर डिवाइन कॉमेडी लिखी. अंतर बस इतना था कि दांते की कहानी में लेखक खुद स्वर्ग और नर्क की यात्रा करता है.

रोहिंटन फली नरीमन बताते हैं कि प्लेटो की कहानी के मुताबिक स्वर्ग या नर्क की यात्रा पूरी करने के बाद ही पुनर्जन्म होता है. इसलिए किसी भी व्यक्ति को अपने अगले जन्म के लिए बहुत ही सावधान रहना चाहिए. क्योंकि अगले जन्म के चुनाव का अधिकार व्यक्ति का स्वयं होता है. कई बार गलत चुनाव हो जाता है. अगर आप ताकत से प्यार करते हैं और किसी भी तरह से उसे हासिल करना चाहते हैं तो हो सकता है कि आपके अगले जन्म का चुनाव तानाशाह के तौर पर हो. आपको मालूम होना चाहिए कि तानाशाह की किस्मत में आखिर में फांसी ही आती है. प्लेटो का कहना था कि जैसा आप बोते हैं, नैतिक रूप से आप वैसा ही काटते हैं.

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प्लेटो ने भी मानी थी पुनर्जन्म की बात


चीनी दार्शनिकों की अलग राय

पुनर्जन्म पर बात करते हुए रोहिंटन फली नरीमन ने बताया कि चीनी दार्शनिक कंफ्यूसियस और लाओ त्जु ने पुनर्जन्म की अवधारणा पर बात नहीं की. कंफ्यूसियस अपने पूर्वजों की पूजा की बात करते थे. कंफ्यूसियस का मानना था कि कोई व्यक्ति धार्मिक होने के आधार पर ही महान हो सकता है. लाओ त्जु ने ताओ को उपदेश दिया था. उन्होंने कहा था कि आपको प्रकृति की तरह हर चीज में निष्क्रिय रहना चाहिए. उन्होंने कहा कि उस पत्थर और पानी की धार को देखो. सदियों से पानी की धार पत्थर के ऊपर गिरती रहती है. दोनों ने एकदूसरे को स्वीकार कर लिया है. यही सच्ची राह है.

रोहिंटन फली नरीमन बताते हैं कि दुनिया के दो अन्य प्राचीन धर्म- मिस्र का धर्म और शिंतो धर्म पुनर्जन्म के बारे में ज्यादा नहीं बताते हैं.

जैन धर्म में पुनर्जन्म की अवधारणा

रोहिंटन फली नरीमन ने जैन धर्म के बारे में भी बताया. वो बताते हैं कि जैन धर्म की शुरुआत महावीर से नहीं हुई. महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे. तीर्थंकर ऐसा व्यक्ति होता है जो निर्वाण प्राप्त करने के लिए सबकुछ छोड़ दे. निर्वाण प्राप्त करने का मतलब है अपने वास्तविक रूप या जीव यानी आत्मा रूप में वापस हो जाना. यहां थोड़ी देर सोचते हैं.

जैनियों के मुताबिक छह तरह के द्रव्य होते हैं. इनमें एक चेतन है और बाकी पांच अचेतन. जीव या आत्मा चेतन है और इस ब्रह्माण्ड में अनगिणत जीव मौजूद हैं. जबकि भगवान नहीं है. ये महत्वपूर्ण है कि जैन धर्म एक नास्तिक धर्म है. ये आपको बताता है कि भगवान का अस्तित्व क्यों नहीं है. ये वही नास्तिक विश्वास है, जो पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को प्रसारित करता है.

रोहिंटन फली नरीमन बताते हैं कि जैन धर्म के मुताबिक धरती पर 84 लाख जिंदगियां हैं. ये 84 लाख जिंदगियां पौधे और जानवरों के तौर पर मौजूद हैं. इन 84 लाख जिंदगियों में मानव की जिंदगी हासिल करना सांप सीढ़ी के खेल की तरह है. अगर आप नैतिकता की सीढ़ी पर ऊंची छलांग नहीं लगाते हैं और अगर आप कुछ गलत करते हैं तो आप नीचे फिसल जाते हैं. फिर आपको दोबारा से ऊपर चढ़ना होता है. और यही चक्र चलता रहता है. जैनियों के इसी सिद्धांत को बुद्धिज्म और हिंदुइज्म ने भी अपनाया है.

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(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from News 18.)