ह्वेन त्‍यांग और महाबलीपुरम... इस खास रिश्‍ते की वजह से इस प्राचीन शहर में मिलेंगे मोदी-जिनपिंग

ह्वेन त्‍यांग और महाबलीपुरम... इस खास रिश्‍ते की वजह से इस प्राचीन शहर में मिलेंगे मोदी-जिनपिंग

नई दिल्ली: दो दिन के दौरे पर आज भारत आ रहे चीनी राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) का विमान नई दिल्‍ली (New Delhi) की बजाय दक्षिण भारत (South India) में उतरेगा. दोपहर 2.10 बजे चेन्नई एयरपोर्ट पर उनके विमान के उतरने के बाद जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के बीच ऐतिहासिक मुलाकात तमिलनाडु (Tamil Nadu) के महाबलीपुरम (Mahabalipuram) में होगी. समंदर किनारे बसे इस अत्‍यंत प्राचीन शहर में दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों का मिलना कूटनीतिक और ऐतिहासिक लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है, क्‍योंकि जिनपिंग को सीधे महाबलीपुरम बुलाए जाने के पीछे भी वजह है. वह वजह है इस जगह का चीन के साथ पौराणिक महत्‍व और जुड़ाव.

मुलाकात के लिए महाबलीपुरम को ही क्‍यों चुना गया?
दरअसल, सभी ये जानना चाहते हैं कि चीनी राष्‍ट्रपति और पीएम मोदी की भारत में मुलाकात के लिए महाबलीपुरम को ही क्‍यों चुना गया? तो इसके पीछे वजह है दक्षिण भारत के इस प्राचीन शहर का चीन से पुराना रिश्‍ता. जी हां, महाबलीपुरम का चीन के साथ करीब 2000 साल पुराना रिश्‍ता है. कहते हैं कि महाबलीपुरम से चीन के व्यापारिक रिश्ते करीब 2000 साल पुराने हैं. समंदर किनारे बसे इस बंदरगाह वाले शहर का चीन से इस कदर पुराना नाता है कि यहां और इसके आसपास के इलाके में चीनी सिक्‍के भी मिले.

इस मायने में अहम रहा महाबलीपुरम...
महाबलीपुरम या ममल्‍लापुरम (Mamallapuram) प्रसिद्ध पल्‍लव राजवंश की नगरी थी. इसके चीन के साथ व्‍यापारिक के साथ ही रक्षा संबंध भी. इतिहासकार मानते हैं कि पल्‍लव शासकों ने चेन्‍नई से 50 किमी दूर स्थित ममल्‍लापुरम के द्वार चीन समेत दक्षिण पूर्वी एशियाओं मुल्‍कों के लिए खोल दिए थे, ताकि उनका सामान आयात किया जा सके.

Xuanzang
चीन के मशहूर दार्शनिक ह्वेन त्सांग...

चीन के मशहूर दार्शनिक ह्वेन त्सांग भी 7वीं सदी में यहां आए थे. वह एक चीनी यात्री थे, जोकि एक दार्शनिक, घूमंतु और बेहतरीन अनुवादक भी था. ह्वेन त्सांग को 'प्रिंस ऑफ ट्रैवलर्स' कहा जाता है. बताया जाता है कि ह्वेन त्सांग को सपने में भारत आने की प्रेरणा मिली, जिसके बाद वह भारत आए और भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का दौरा भी किया. इसके बाद उन्‍होंने उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाकों की यात्रा भी की. उन्‍होंने बौद्ध धर्मग्रंथों का संस्कृत से चीनी अनुवाद भी किया. माना जाता है कि ह्वेन त्सांग भारत से 657 पुस्तकों की पांडुलिपियां अपने साथ ले गया था. चीन वापस जाने के बाद उसने अपना बाकी जीवन इन ग्रंथों का अनुवाद करने में बिता दिया.

पीएम नरेंद्र मोदी और चीनी राष्‍ट्रपति शी चिनफिंग महाबलीपुरम में इन 3 जगहों पर जाएंगे...

इनमें पहला 'द शोर टेम्पल' है. समुद्र तट पर बना यह द्रविड़ स्थापत्य की बेजोड़ मिसाल है. पल्लव शासकों ने ग्रेनाइट के पत्थरों से तराशे गए इस मंदिर का निर्माण करवाया था. दरअसल यह भगवान विष्णु का मंदिर है.

The Shor Temple
द शोर टेम्पल...

दूसरी जगह है 'पंच-रथ'... मान्‍यता है कि पंच रथ का ताल्लुक महाभारत काल की कथा से ताल्‍लुक है. इन रथों को पल्लव शासकों ने बनाया था और इसे पांच पांडवों और उनकी पत्नी द्रौपदी का नाम दिया. पौराणिक मान्‍यता के अनुसार, पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान द्रोपदी के साथ महाबलीपुरम में काफी वक्त बिताया था.

 Panch-Rath
पंच-रथ...

तीसरी जगह है 'अर्जुन्स पेनेन्स'... यह एक शिला पर हस्तशिल्प कला का पूरी दुनिया में इकलौता मॉडल है. इसे पहाड़ी को काटकर गुफानुमा मंदिर बनाया गया. कहते हैं कि अर्जुन ने महाभारत की लड़ाई जीतने के लिए अस्त्र शस्त्रों की प्राप्ति के लिए यहीं भगवान शिव की उपासना की थी.

Arjuna Penance
अर्जुन्स पेनेन्स...

 


(Disclaimer: This article is not written By 24Trends, Above article copied from Zee News.)